Tuesday, December 30, 2014

सुर्खियों के सरताज 2014: कब-कब और किन वजहों से सुर्खियों में रहे मोदी

अपनी तस्वीरों के घटाटोप में यह शख्स एक साथ कई जगह मौजूद रहा. झक सफेद कपड़ों में कभी वह झाड़ू लगाता दिखा तो अगले ही पल आप ने उसे बराक ओबामा के साथ मार्टिन लूथर किंग के स्मारक पर लगी प्रतिमा की तरफ इशारा करते हुए पाया. वह कभी मेडिसन स्क्वायर गार्डन में प्रवासी भारतीयों के साथ एक रैली में नजर आया या उद्योगपतियों से ‘‘मेक इन इंडिया’’ का आह्वान करता हुआ दिखा तो पलक झपकते ही किसी मतदान केंद्र के बाहर सेल्फी लेते हुए नजर आया या फिर शिक्षक दिवस पर बच्चों को ज्ञान बांटता दिखा. बीते साल यह शख्स हर जगह छाया रहा-नरेंद्र मोदी 2014 का पर्याय है. बंधी हुई मुट्ठी और कथित 56 इंच के सीने वाला स्वयंभू मोदी अपने प्रचार अभियान के दौरान उस भारत का पारिभाषिक प्रतीक बन चुका था जो थके-हारे अभिजात्यों की यूपीए नामक मंडली से निजात पाने को बेचैन था. मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए खानदानी रइसों और पुराने सत्ताधारी कुलीनों के खिलाफ उसकी दहाड़ पूरी दुनिया में गूंज रही थी. अमेठी से लेकर चेन्नै तक और बस्तर से लेकर केरल तक आकांक्षाओं के सैलाब पर सवार जबरदस्त ऊर्जा से युक्त इस शख्स की प्रत्येक सार्वजनिक उपस्थिति पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंकने का आह्वान थी, जिसमें देह से धूल झड़कर खड़ा हुआ एक ‘‘चायवाला’’ अपने मामूली अतीत की शेखी बघारता हुआ कहना चाह रहा हो, ‘‘अगर मैं कर सकता हूं तो आप क्यों नहीं!’’ ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज से शिक्षित अभिजात्यों के खिलाफ जंग पर निकला उनका यह वर्ग शत्रु देसी कारोबारियों और पूंजीपतियों का मित्र भी है. वह हिंदुत्व का नायक है लेकिन अपने साथ अत्याधुनिक और उच्च-तकनीक वाला मीडिया लेकर चलता है. वह वैश्वीकृत भारत का एक ऐसा जन-समर्थित प्रतीक है जिसकी विजयी निगाहें वैदिक युग पर टिकी हुई हैं.

बेशक, इस देश की सत्ता आज उस डिजाइनर कुर्ते से निकल रही है जो कभी गुजरात में सिला गया था. बीते दिसंबर की ही एक ठंडी शाम का किस्सा है जब राष्ट्रपति भवन ने अपने सेरेमोनियल हॉल की नई विंग के उद्घाटन का आयोजन रखा था. लुटियन की दिल्ली के सारे असरदार सत्ताधीश यहां मौजूद थेः मंत्रियों, राज्यपालों से लेकर सेना प्रमुखों और खुद राष्ट्रपति तक. घड़ी के कांटे जैसे ही नियत समय पर पहुंचे, अपने ट्रेडमार्क   चूड़ीदार-कुर्ते में टहलते हुए प्रधानमंत्री भीतर आए. कमरे में चल रही चटर-पटर अचानक सन्नाटे में तब्दील हो गई. वहां जुटे वीआइपी इस महानायक की निगाह में आने के लिए धक्का-मुक्की करने लगे. इसमें कोई शक नहीं कि 2014 में मोदी विशाल शख्सियत के तौर पर उभरे हैं. सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी को छोड़ दें तो गठबंधन सरकारों के तले ढाई दशक लंबा दौर देखने के बाद पहली बार भारत अपने सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री का गवाह बना है जो भारी बहुमत के साथ आया है.

यह तस्वीर हमेशा से ऐसी नहीं थी. मोदी पहली बार मैग्जीन के कवर पर 2002 में छपे थे. उन्हें तब ‘‘मास्टर डिवाइडर’’ कहा गया था, एक ऐसा नेता जिसने अपनी नाक के नीचे गुजरात में भयावह सांप्रदायिक दंगों को होने दिया था जिसमें 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. उस समय वे समाज को तेजी से बांटने वाला बनकर उभरे थेः अपने आलोचकों के लिए वे हिटलर जैसे तानाशाह थे जिसने जान-बूझकर निर्दोष मुसलमानों की हत्या को नहीं रोका था. अपने समर्थकों के लिए वे ‘‘हिंदू हृदय सम्राट’’ थे, ऐसा नायक जिसने गोधरा में ट्रेन जलाने की घटना के बाद बहुसंख्यक समुदाय की रक्षा की थी जिसमें 56 कारसेवक मारे गए थे. कांग्रेस के नेतृत्व ने उन्हें ‘‘मौत का सौदागर’’ कहा तो उनके अपने लोगों ने उन्हें ‘‘गुजरात का शेर’’ के तमगे से नवाजा. इससे पहले कभी किसी शख्स ने जनमत को इतनी सफाई से नहीं बांटा था.

थोड़ा और पीछे  चलें. 1990 का दशक था. मोदी सियासत की सीढिय़ों पर चढऩे की जोर-आजमाइश में लगे थे. कांग्रेस के प्रभुत्व को चुनौती देने की दिशा में धीरे-धीरे उभर रही बीजेपी के भीतर वे कभी भी पार्टी की अगली पीढ़ी के नेताओं में नहीं थे. तब प्रमोद महाजन का दौर था, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दाहिने हाथ और मुख्य रणनीतिकार हुआ करते थे. तब सुषमा स्वराज प्रचार के मैदान में बिजलियां गिराती थीं, तो विचारधारा की कमान गोविंदाचार्य के कुशल हाथों में थी. ऐसे प्रचारक के तौर पर जिसने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा और जिसका राजकाज में कोई तजुर्बा नहीं था. मोदी किसी भी अन्य संघी प्रचारक की ही तरह परदे के पीछे रहते थे. हां, कपड़े उस समय भी उनके चकाचक हुआ करते थे. वे टीवी पर पार्टी प्रवक्ता की हैसियत से प्रभावशाली वक्तव्य देते थे और लालकृष्ण आडवाणी तथा मुरली मोहर जोशी की यात्राओं के दौरान जबरदस्त सांगठनिक कुशलता दिखा चुके थे. इसके बावजूद वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी के संभावित उत्तराधिकारियों की अगली कतार में वे कभी भी नहीं रहे.

फिर भी उन्हें खुद पर भरोसा था, एक दृढ़ संकल्प कि वे महान कार्यों के लिए ही बने हैं. सामान्यतः संघ के प्रचारकों को संगठन के लिए संपूर्ण समर्पण की वजह से अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को दबाना-छिपाना होता है लेकिन मोदी इस मामले में अलग थे. समाज में आरएसएस का संदेश फैलाने को लेकर दूसरे प्रचारकों की तरह उनके भीतर किसी कपोल-कल्पित आदर्श का वास नहीं था. वे इसी दुनिया की निर्मम सियासत का अनिवार्य हिस्सा थे और गुजरात का मुख्यमंत्री बनने को बेताब भी थे. हो सकता है, उनके मन में किसी दिन प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश भी रही होगी. उनके दिमाग में अपने उद्देश्य को लेकर कोई भ्रम नहीं था-वे बीजेपी की तरक्की के लिए समर्पित वफादार कार्यकर्ता थे, लेकिन वे भयंकर रूप से व्यक्तिवादी भी थे, जमीनी सियासत के ऐसे निष्ठुर खिलाड़ी जिसे अपने सियासी प्रतिद्वंद्वी को ठिकाने लगाने में लेशमात्र संकोच नहीं होता.
इस बात को किसी और से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से संघ समझता था जिसकी शाखाओं में मोदी का पालन-पोषण हुआ था. शायद यही वजह रही होगी कि वडनगर के इस प्रचारक को उसका देय लौटाने के मामले में संघ परिवार के भीतर किन्हीं मौकों पर संकोच रहा होगा. मसलन, मोदी के समर्थकों के एक समूह ने 2008 में जब सरसंघचालक मोहन भागवत से अपील की कि गुजरात के मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा जिम्मेदारियां सौंपी जाएं, तो भागवत (जो उस समय संघ में दूसरे नंबर पर थे) का जवाब यह थाः ‘‘हम उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तो बना सकते हैं, लेकिन किसी दिन ऐसा न हो कि वे सरसंघचालक बनने की इच्छा पाल बैठें!’’ मोदी से निबटने के मामले में हमेशा से भय और विस्मय का एक मिश्रित भाव मौजूद रहा है और इस द्वंद्व को सुलझा पाना इतना आसान नहीं रहा है.

मोदी कल्ट का जन्म
हिंदुत्व की विभाजनकारी राजनीति के ध्वजावाहक के तौर पर मोदी के अंधेरे पक्ष का उद्घाटन अगर 2002 और उसके बाद की परिस्थितियों ने किया, तो उसके बाद के वर्षों में उनकी छवि का दूसरा पहलू उभरा. हिंदुत्व के नायक से सुशासन गुरु के चोले में मोदी का प्रवेश सुनियोजित और रणनीतिक तो था ही, लेकिन इसके पीछे काफी कड़ी मेहनत और खुद को दुरुस्त करने की लगातार चली आ रही तलाश भी थी. उन्होंने जब अक्तूबर, 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला, तो उन्होंने खुद माना था कि वे कभी भी किसी सरकारी दफ्तर में तब तक नहीं बैठे थे या सरकारी फाइलों को कभी छुआ था. हां, सफल होने का संकल्प उनके मन में जरूर था. उन्होंने ऐसे ‘‘कर्मयोगी’’ नेता के रूप में छवि बनाई जो सरकारी कार्यक्रमों के प्रभावी और जमीनी प्रबंधन के लिए अफसरशाही के साथ मिलकर काम कर सकता थाः चौबीस घंटे सातों दिन बिजली, लड़कियों की शिक्षा, सिंचाई योजनाएं इत्यादि. मोदी ने अपने नेतृत्व में राज्य के प्रशासन को परियोजना संचालित सक्षम मशीन में तब्दील कर दिया था.
मोदी के राजनैतिक करियर में वास्तव में दो निर्णायक मोड़ आए. पहला गोधरा में ट्रेन का जलाया जाना और उसके बाद हुए दंगे थे, जब राज्य प्रशासन की नाकामी के लिए उन्होंने खेद जताने या पश्चाताप करने से इनकार कर दिया और इस तरह उनकी एक विशिष्ट राजनैतिक पहचान बनी. दूसरा निर्णायक पल 7 अक्तूबर, 2008 को आया जब टाटा समूह ने ऐलान किया कि वह गुजरात के साणंद में नैनो का प्लांट लगाएगा. प्लांट को बंगाल से गुजरात लाने का फैसला मोदी को वह वस्तु दे गया जो उन्हें 2002 या एक के बाद एक मिली चुनावी जीत भी नहीं दे सकी थी-एक भरोसेमंद प्रशासक के रूप में विश्वसनीयता.

यही वह मोड़ था जब मोदी की महत्वाकांक्षाओं का गुब्बारा गुजरात की सरहद को लांघने लगा. दंगों ने उन्हें सियासी रूप से अकेला छोड़ दिया था; टाटा से मिला विश्वास बेहद सम्मानित कॉर्पोरेट नागरिक से मिली मान्यता भी थी जिसने उनमें यह आत्मविश्वास फूंका कि उनके खिलाफ उठी लहर अब लौट चुकी है. फिर उन्होंने एक तड़क-भड़क से युक्त जनसंपर्क माध्यमों के सहारे खुद को सुशासन के लिए कटिबद्ध ऐसे नेता के तौर पर प्रचारित करवाना शुरू किया जिसे भ्रष्ट नहीं किया जा सकता और जो उच्च वृद्धि और ठोस बुनियादी ढांचे वाले ‘‘गुजरात मॉडल’’ का चालक रहा है. इस काम को ऐसे अंजाम दिया गया कि गुजरात मॉडल और मोदी कल्ट एक-दूसरे के पर्याय बन जाएं.
न्यूयार्क के मेडिसन स्कवायर में मोदी
(न्यूयार्क के मोडिसन स्कवायर गार्डन पर समर्थकों को संबोधित करते मोदी)

सुशासन गुरु
यह वही दौर था जब मोदी ने परंपरागत ‘‘हिंदू’’ वोटर के दायरे से बाहर निकलकर अपने समर्थकों का नया ठिकाना खोजाः वे अब खुद को उस समुदाय के नायक के तौर पर स्थापित करने में जुट गए जिसे वे ‘‘नया मध्यवर्ग’’ कहते हैं. मोदी के लिए यह ‘‘नया मध्यवर्ग’’ कांग्रेस के ‘‘आम आदमी’’ का जवाब था जिसे 2014 के चुनावों से पहले उनके नारों के केंद्र में होना था. मोदी ने इसी आबादी को ‘‘उम्मीदों से लबरेज’’ भारत कहा, वह भारत जो बेहतर जीवन और संपन्नता के लिए बेचैन है. विडंबना देखिए कि यही वह वर्ग था जिसे 1991 में नरसिंहराव-मनमोहन सिंह के शुरू किए गए महान आर्थिक उदारीकरण का फायदा मिल चुका था. सिंह ने अर्थव्यवस्था को तो बदल दिया लेकिन इससे पैदा हुई राजनैतिक उथल-पुथल को वे पर्याप्त समझ नहीं पाए थे. इसमें कोई शक नहीं कि 1991 में हुए महान बदलाव ने जिस राजनीति को जन्म दिया, उसे कांग्रेस से बेहतर मोदी ने आत्मसात किया.
उदारीकरण ने आज युवा भारतीयों की एक ऐसी पीढ़ी को जन्म दिया है जिनके लिए बेहतर जिंदगी की बुनियादी कसौटी धनार्जन तथा सामाजिक और भौतिक तरक्की बन चुके हैं. यह मानसिकता लाइसेंस-परमिट राज के दौर के उनके बाप-दादाओं की पीढ़ी से बिल्कुल जुदा है जिनकी महत्वाकांक्षाएं सरकारी नौकरियों और अकादमिक योग्यता के इर्द-गिर्द मंडराती थीं. तेजी से बदलते और शहरीकृत होते भारत में इस तबके के लिए मोदी बड़ी सहजता से एक उम्मीद जगा रहे थे, जैसे ‘‘अच्छे दिन आएंगे’’ के उनके चुनावी नारे में दिखता है. फिर इसमें कोई संदेह नहीं कि 2014 के चुनावों में बीजेपी को सबसे ज्यादा समर्थन पहली बार वोट देने वाले युवाओं और ‘‘युवा’’ भारत से मिलाः सीएसडीएस का अध्ययन दिखाता है कि 18 से 25 साल की उम्र के बीच 42 फीसदी भारतीय युवा मोदी को अपना प्रधानमंत्री देखना चाहते थे जबकि 16 फीसदी ऐसे थे जिनकी पसंद राहुल गांधी थे.

यह अपने आप में ज्यादा दिलचस्प बात है कि 2014 के चुनावों में 64 साल का एक नेता अपने से 20 साल छोटे मुख्य प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले युवा वोटरों की पहली पसंद था. मोदी युवाओं के साथ लगातार संवाद में दिखते थे और उनकी भावनाओं से जुड़ते थे, चाहे वे कॉलेज परिसरों में टाउनहॉल सभाओं को संबोधित कर रहे हों या फिर अपनी संचार टीम के सहारे ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल मीडिया वेबसाइटों पर मौजूद हों. राहुल के बारे में तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि उन्होंने मौके गंवाने में कोई मौका नहीं गंवाया. उनका न तो फेसबुक अकाउंट है और न ही कोई ट्विटर खाता.

बेशक, अपने ‘‘मिशन 272’’ प्रोजेक्ट में सहयोग करने के लिए मोदी को इस नए वर्ष पर राहुल को धन्यवाद देता हुआ एक कार्ड भेजना चाहिए, लेकिन मनमोहन सिंह को तो एक शुभकामना कार्ड बनता ही है. पूर्व प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के तैनात किए वजीर मनमोहन सिंह एक मृदुभाषी विद्वान थे जो लगातार आरोप लगाते मीडिया, मांग करते नागरिकों और जवाबदेही के नारों से चौतरफा घिरे हुए अपनी नाउम्मीदी में क्षितिज को निहार रहे थे. अपने मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के लगातार बढ़ते आरोपों की सूरत में इस भले सरदार ने इतनी लंबी चुप्पी ओढ़ ली कि इससे यह छवि बनी गोया उन्होंने मैदान में घुटने टेक दिए हैं और वस्तुतः देश में कोई प्रधानमंत्री है ही नहीं. सबसे ज्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश को देखिए तो वहां अखिलेश यादव अभी राजकाज की जटिलताओं से निबटने में संघर्ष ही कर रहे थे और राजनीति के मैदान में वे कच्चे खिलाड़ी थे. महाराष्ट्र जैसे एक अहम राज्य में अजित पवार का ‘‘किसानों के बांधों में पेशाब करने वाला’’ कुख्यात बयान सत्ताधारी गिरोह के नैतिक दिवालिएपन का पता दे रहा था जिस पर ‘‘नेशनल करप्ट पार्टी’’ का नाम चस्पां कर दिया गया था. मणिशंकर अय्यर ने चायवाला पर दिए अपने गैर-जिम्मेदाराना बयान से कांग्रेस के ही पोस्ट में गोल दाग दिया जिसकी वजह से बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को बड़ी आसानी से यह मौका हाथ लग गया कि वे अपनी हासिल की गई उपलब्धियों के बरअक्स राज करने के लिए पैदा हुए अभिजात्य तबके को खारिज कर पाते.

एक धन्यवाद ज्ञापन मीडिया को भी भेजा जाना चाहिए जिसका एक बड़ा हिस्सा मोदी के खेल में चीयरलीडर बना हुआ था. मोदी टीवी युग के नेता हैः वे जबरदस्त वक्ता हैं, उनका कैमरा प्रेम जगजाहिर है और वे तुरंत यह जान लेते हैं कि क्या चीज ‘‘खबर’’ बनेगी. साउंडबाइट से गढ़ी जाने वाली समकालीन सार्वजनिक बहसों के इस दौर में मोदी ने मीडिया का, खासकर टीवी का जमकर इस्तेमाल किया और खुद को ऐसे सशक्त विचारों से ओत-प्रोत नेता के रूप में स्थापित किया जो देश को गंदगी और भ्रष्टाचार से मुक्ति दिला सकता था. मीडिया के लिए मोदी टीआरपी का सबब थे और ऐसा लगता था कि बीजेपी का यह शुभंकर हमारी जिंदगी की हर हरकत पर कब्जा कर चुका है. मीडिया चाहे कोई भी हो, उस पर तस्वीर मोदी की ही रहती थी.

मोदी का चुनाव प्रचार अपने आप में विलक्षण थाः इसमें मीडिया, धन और प्रौद्योगिकी का ऐसा संगम था जिसने विपक्ष को वास्तव में हैरत में डाल दिया. मसलन, मोदी इन 3डी ने दिखाया कि कैसे अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल मोदी के संदेश को हर जगह प्रसारित करने में हो सकता है; मिस्ड कॉल और एसएमएस ने यह साबित किया कि कैसे सेलफोन का इस्तेमाल कार्यकर्ताओं की फौज तैयार करने में हो सकता है; उत्तर प्रदेश और बिहार के ‘‘मीडिया से दूर’’ गांवों में अचानक पहुंचे वीडियो रथ ने शहर और गांव की खाई को ही पाट डाला. और यह सारा खेल सिर्फ एक आदमी के बस का नहीं था. इसके पीछे टीम मोदी थी जिसमें युवा, टेक्नोक्रेट्स समर्थक मौजूद थे जिनकी कमान कहीं ज्यादा खांटी और चालाक नेता अमित शाह के हाथों में थी. दूसरी ओर आरएसएस के वे कार्यकर्ता थे जो घर-घर जाकर प्रचार कर रहे थे, क्योंकि सत्ता की प्यास बुझाने की चाह में उनके लिए यह चुनाव जीवन और मरण का सवाल बन चुका था.

सचाई तो यह है कि मीडिया ने मोदी लहर को पैदा नहीं किया. वह सिर्फ  उस लहर पर सवार था. यह लहर (जिसे शाह ने सुनामी या सुनमो कहा था) उस सियासी माहौल की उपज थी जिसमें खराब ग्रोथ, महंगाई, भारी भ्रष्टाचार आदि ने नकारात्मकता का बोध पैदा किया था और यहां तक कि मतदाताओं के मन में नाउम्मीदी का भाव घर कर चुका था. मतदाताओं को आर्नोल्ड ‘‘वार्जेनेगर जैसे किसी ऐसे टर्मिनेटर (महामानव) की तलाश थी जो देश की समस्याओं को जादू की छड़ी घुमा ठीक कर देता.

सब ले गई सुनामी
चुनाव के बाद हुआ एक अध्ययन बताता है कि बीजेपी को वोट देने वाले हर चार में से एक यानी 27 फीसदी लोगों का कहना था कि उन्होंने मोदी के कारण वोट दिया. कांग्रेस में जिस किस्म की हताशा छाई हुई थी, ऐसे में बीजेपी को तो वैसे भी पहले स्थान पर रहना था लेकिन वह मोदी फैक्टर था जिससे पार्टी को इतने वोट मिले कि उसने अपने ही दम पर बहुमत की सीमारेखा को पार कर लिया. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा था, ‘‘यह नेता सही समय, सही जगह और सही परिप्रेक्ष्य में आया है.’’

नरेंद्र दामोदरदास मोदी को 26 मई, 2014 को भारत के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई. यह देश में पहली बार आई स्थिर हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के मुख्य कार्यकारी की शपथ थी. यह वाजपेयीनीत एनडीए जैसी गठबंधन की सरकार नहीं थी; एनडीए-2 बीजेपी की सरकार थी जहां गठबंधन सहयोगियों को, यहां तक कि शिवसेना जैसे पुराने सहयोगियों को भी बीजेपी नेतृत्व के आगे घुटने टेकने पड़े थे. यह समारोह अपने आप में मोदी का पुट लिए हुए था. इसे परंपरागत रूप से दरबार हॉल में नहीं बल्कि राष्ट्रपति भवन के बाहर आयोजित किया गया थाः यह समारोह एक ‘‘बाहरी’’ के आगमन और नए दिल्ली दरबार की मुनादी के लिए किया जा रहा था.

मोदी हमेशा से ही बेहतरीन संयोजक रहे हैः उनका शपथ समारोह भी सुनियोजित आयोजन था. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ समेत पहली बार दक्षेस देशों के नेताओं की वहां मौजूदगी हलचल पैदा करने के उद्देश्य से थी ताकि नए प्रधानमंत्री को कथित मशîर नेता के तौर पर पेश किया जा सके. विदेश मंत्रालय के अफसरों को आखिरी पल तक इस योजना की खबर नहीं थी. विशुद्ध मोदी शैली में वे समूचे सत्ता प्रतिष्ठान को एकबारगी हिला देना चाहते थे. उन्हें अपनी ‘‘बाहरी’’ की छवि पर गर्व होता है, ऐसा शख्स जो लुटियंस की दिल्ली के नियमों-कानूनों और औपचारिकताओं की जंजीरों में बंधने से इनकार करता हो; ऐसा शख्स जो इतना अलग हो कि अपने परिवार तक को शपथ समारोह में आने का न्योता न देता हो.

अमेरिका में उन्होंने एक बार फिर शोमैन का किरदार निभाया और मेडिसन स्कवायर को प्रवासी भारतीयों के प्रेमोत्सव में बदल डाला; वे सेंट्रल पार्क  में चल रहे संगीत समारोह तक में चले गए, हॉलीवुड के हीरो ह्यू जैकमैन के साथ कंधे से कंधा मिलाया और भीड़ का अभिवादन बिल्कुल सत्तर के दशक वाली स्टार वॉर्स शैली में किया, ‘‘मे द फोर्स बी विद यू’’ (सर्वसत्ता आपके साथ हो). दंगों के बाद अमेरिका ने कई वर्ष तक मोदी को वीजा नहीं दिया तो क्या, मोदी भी ठान बैठे थे कि वैश्विक नेता बनने की राह में इसे आड़े नहीं आने देना है.

स्वच्छ छवि
मोदी प्राइम टाइम पर सुर्खियां बटोरने वाले एक लाइन के नारे (जैसे उनका भ्रष्टाचार विरोधी नारा न खाऊंगा न खाने दूंगा) गढऩे में माहिर हैं, खुद को प्रेरणादायी व्यक्तित्वों (कभी सरदार पटेल, तो कभी विवेकानंद) से जोडऩा पसंद करते हैं और ऐसे सरल किंतु मौन विचारों को बाजार में फेंकना पसंद करते हैं, जिन्हें लोकप्रियता मिलने का उन्हें भरोसा होता है. स्वाधीनता दिवस पर उनका भाषण राष्ट्र के नाम पारंपरिक संदेश नहीं, अलग तरह का प्रदर्शन था. उन्होंने योजना आयोग को मिटाने और शौचालय बनाने के नए मिशन का वादा किया. उनका यह कथन देश को गुदगुदाने के लिए काफी था, ‘‘यह कैसा प्रधानमंत्री है, जो लालकिले पर खड़ा होकर शौचालय बनाने की बात करता है?’’ महात्मा गांधी की जयंती पर औपचारिक रूप से शुरू किए गए स्वच्छ भारत अभियान का मकसद सफाई का संदेश कोने-कोने तक पहुंचाना है.

यूपीए सरकार भी स्वच्छता के लिए निर्मल भारत अभियान चला रही थी. इसके प्रभारी मंत्री रहे जयराम रमेश ने आजतक एजेंडा कॉनक्लेव में अफसोस जाहिर करते हुए कहा था, ‘‘हमने तो अभिनेत्री विद्याबालन को ब्रांड अंबेसडर भी बनाया था, पर हम मोदी जी की तरह इसे बेचना नहीं जानते थे.’’ मोदी की नीतियां कितनी ही उधार की क्यों न लगें, उनके आलोचक भी मानते हैं कि मोदी का संवाद कौशल गजब का है. महात्मागांधी के पौत्र राजमोहन गांधी का कहना है कि यह दैवी गुण महात्मा में भी था. उन्होंने हाल ही में कहा, ‘‘बड़ा फर्क यही है कि बापू के लिए संदेश सबसे अहम था, जबकि मोदी हमेशा खुद को आगे रखने को आतुर रहते हैं.’’

वास्तव में हर चुनाव के बाद यह और स्पष्ट हो रहा है कि भारतीय राजनीति के अखाड़े में एक तरफ मोदी हैं, तो दूसरे पाले में बाकी सब. उनके घोषित शत्रु लालू यादव और नीतीश कुमार भी मोदी के रथ को बिहार को रौंदने से रोकने के लिए साथ आने पर मजबूर हुए हैं. मोदी वह गोंद हैं, जो हताश विपक्ष को वैसे ही चिपका रही है, जैसे 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के दबदबे ने जनता पार्टी की खिचड़ी मिलाई थी. कांग्रेस अभी तक चुनावी हार को गटक नहीं पाई है. इसलिए विपक्ष का खाना खाली है. पश्चिम बंगाल में अपने गढ़ में आतंकित ममता बनर्जी को ही विपक्ष का परचम उठाना पड़ रहा है, जिससे पता चलता है कि मोदी राज के विरोध में राजनैतिक बहस का पहला सूत्र अपना बचाव करना है.

अपने भरोसेमंद सिपाही अमित शाह को बीजेपी अध्यक्ष की गद्दी देकर मोदी ने पार्टी पर जकड़ मजबूत कर ली है. पुराने दिग्गजों को मार्गदर्शक मंडल में समेट दिया है और साथियों के पास मोदी की परम सत्ता के सामने घुटने टेकने के सिवाए कोई चारा नहीं है. 2014 में कश्मीर घाटी में भले ही कमल न खिल सका हो, लेकिन मोदी और शाह की जोड़ी ने जम्मू-कश्मीर चुनाव में जिस तरह मिशन 44 का शंखनाद किया, उससे हर काल में दिलो-दिमाग पर छाए रहने का उनका इरादा तो जाहिर होता ही है.

मोदी के समर्थक चाहे कितनी भी कोशिश कर लें वे अभी चक्रवर्ती सम्राट नहीं हो पाए हैं. लव जेहाद और धर्मांतरण जैसे हिंदू चरमपंथियों के नारों पर निरंतर बोलने वाले राजनेता मोदी की चुप्पी चिंता पैदा करने वाली है. इसके कारण अल्पसंख्यकों के साथ विश्वास की खाई और चौड़ी हो जाती है. (उन्होंने परंपरा तोड़ी और प्रधानमंत्री की सालाना इफ्तार की दावत करने तथा टोपी पहनने से साफ इनकार कर दिया, जबकि दूसरी तरह की पोशाकें आसानी से पहन लीं). वे अभी तक कोई बड़ा आर्थिक या संस्थागत सुधार नहीं कर पाए हैं, मैन्युफैक्चरिंग में नई जान नहीं आई है, संसद में गतिरोध भी नहीं तोड़ पाए हैं और केंद्र राज्य संबंधों जैसे अहम मुद्दों का समाधान भी नहीं हुआ है. संघ के साथ मोदी के संबंध भी अभी स्पष्ट नहीं हैं. क्या शक्तिशाली प्रधानमंत्री परिवार के नियंत्रण में है? क्या सरकार के सभी फैसले पहले संघ की स्वीकार्यता की कसौटी पर कसे जाएंगे? क्या जिस आरएसएस ने मोदी को बनाया है, वही हिंदू राष्ट्र के शोर से उनकी सरकार की नाक का बाल साबित होगा? जब उम्मीदें इस कदर बुलंद हो जाएं कि आसमान छूने लगें और फिर पूरी न हों तो आलोचकों को चुप नहीं कराया जा सकता. जनता का गुस्सा सारे बांध तोड़ सकता है और 2014 के फैसले को पैरों तले कुचल सकता है. अगर सामाजिक बिखराव को फिर सिर उठाने दिया गया तो जनता की निराशा की गर्मी इस सरकार को पिघला सकती है.

मीडिया का हनीमून भी आज नहीं तो कल खत्म हो जाएगा और टीवी कैमरों की चमक-दमक से दूर भारत का शासन चलाने का मुश्किल लेकिन नीरस काम शुरू करना ही होगा. 2014 प्रचारक का साल रहा, अपने व्यक्तित्व के दम पर चुनाव जीत लिया गया. 2015 प्रशासक का साल हो सकता है, जिसमें वादों को पूरा करके दिखाना होगा. मतदाता ने मोदी को टीवी, सोशल मीडिया और थ्रीडी में देखा है, अब वह उन्हें जीते-जागते इंसान के रूप में देखना चाहेगा.

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